काश...

काश...

ये साल लागे जैसे ख़्वाब ,

किसी भी चीज का यहाँ नहीं हिसाब ,

कही अपनो के साथ लोग ,

कही अपनो के बिना alone।


गहरी दुरीया  जिसे देख समंदर हैरान ,

कहे खुद से ये दुनिया लागे वीरान,


बातों की बारिश अब रुक सी गयी है ,

ना जाने वो ख़ुशियाँ कहा खो गयी है ।


सपनो की दुनिया खूबसूरत होती है अकसर ,

मगर ये सपने जैसी हक़ीक़त ने डरा सा दिया है ,

वीरान सड़के कभी ना थी ,

बादल इतने घने कभी ना थे ,

दुर्घटनायें इतनी कभी ना थी ,


हर छोटी बात से था आदमी घबराता,

‘वह’ उसे हर बार देता समझा,

मगर ना जाने कोनसी परीक्षा ले रहा ,

शायद घबराहट को हमसे दूर कर रहा।


काश के ये सपना होता ,

काश के ये सिर्फ़ सीख होती ,

काश के ये दूरियाँ ना होती ,

काश के ये तकलीफ़ें ना होती ,

काश के ये मजबूरियाँ ना होती ,

काश....

                                       - प्रतीक्षा वाघ

Comments

  1. True And Very Well Written 🧡

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  2. Thank you so much for supporting and motivating me

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