काश...
काश...
ये साल लागे जैसे ख़्वाब ,
किसी भी चीज का यहाँ नहीं हिसाब ,
कही अपनो के साथ लोग ,
कही अपनो के बिना alone।
गहरी दुरीया जिसे देख समंदर हैरान ,
कहे खुद से ये दुनिया लागे वीरान,
बातों की बारिश अब रुक सी गयी है ,
ना जाने वो ख़ुशियाँ कहा खो गयी है ।
सपनो की दुनिया खूबसूरत होती है अकसर ,
मगर ये सपने जैसी हक़ीक़त ने डरा सा दिया है ,
वीरान सड़के कभी ना थी ,
बादल इतने घने कभी ना थे ,
दुर्घटनायें इतनी कभी ना थी ,
हर छोटी बात से था आदमी घबराता,
‘वह’ उसे हर बार देता समझा,
मगर ना जाने कोनसी परीक्षा ले रहा ,
शायद घबराहट को हमसे दूर कर रहा।
काश के ये सपना होता ,
काश के ये सिर्फ़ सीख होती ,
काश के ये दूरियाँ ना होती ,
काश के ये तकलीफ़ें ना होती ,
काश के ये मजबूरियाँ ना होती ,
काश....
- प्रतीक्षा वाघ

Good one pratiksha
ReplyDeleteKeep supporting😇
DeleteThank you ma’am 😊
DeletePratikshaaa! ❤❤
ReplyDeleteKeep supporting 😇
Delete😍😍✨
ReplyDelete👌😍
ReplyDeleteNice😍
ReplyDeleteKeep supporting!😇
Delete👍👍👍👍
ReplyDeleteTysm team meraki 🤩
ReplyDeleteMasterpiece indeed !
ReplyDeleteNice😍
ReplyDeleteTrue And Very Well Written 🧡
ReplyDeleteSahi Wagh 💥💯💯
ReplyDelete👍
ReplyDeleteSundarrrr 💕
ReplyDeleteExcellent
ReplyDeleteThank you so much for supporting and motivating me
ReplyDeleteThank you everyone 😊
ReplyDeleteSuch nice words❤️
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