काश... ये साल लागे जैसे ख़्वाब , किसी भी चीज का यहाँ नहीं हिसाब , कही अपनो के साथ लोग , कही अपनो के बिना alone। गहरी दुरीया जिसे देख समंदर हैरान , कहे खुद से ये दुनिया लागे वीरान, बातों की बारिश अब रुक सी गयी है , ना जाने वो ख़ुशियाँ कहा खो गयी है । सपनो की दुनिया खूबसूरत होती है अकसर , मगर ये सपने जैसी हक़ीक़त ने डरा सा दिया है , वीरान सड़के कभी ना थी , बादल इतने घने कभी ना थे , दुर्घटनायें इतनी कभी ना थी , हर छोटी बात से था आदमी घबराता, ‘वह’ उसे हर बार देता समझा, मगर ना जाने कोनसी परीक्षा ले रहा , शायद घबराहट को हमसे दूर कर रहा। काश के ये सपना होता , काश के ये सिर्फ़ सीख होती , काश के ये दूरियाँ ना होती , काश के ये तकलीफ़ें ना होती , काश के ये मजबूरियाँ ना होती , काश.... - प्रतीक्षा वाघ